ऐ नये साल

Reflections
January 1, 2012: Reflections.

ऐ नये साल बता, तुझ में नयापन क्या है
हर तरफ ख़ल्क ने क्यों शोर मचा रखा है

रौशनी दिन की वही, तारों भरी रात वही
आज हमको नज़र आती है हर बात वही

आसमां बदला है अफसोस, ना बदली है जमीं
एक हिन्दसे का बदलना कोई जिद्दत तो नहीं

अगले बरसों की तरह होंगे करीने तेरे
किसे मालूम नहीं बारह महीने तेरे

जनवरी, फरवरी और मार्च में पड़ेगी सर्दी
और अप्रैल, मई, जून में होवेगी गर्मी

तेरे मान-दहार में कुछ खोएगा कुछ पाएगा
अपनी मय्यत बसर करके चला जाएगा

तू नया है तो दिखा सुबह नयी, शाम नई
वरना इन आंखों ने देखे हैं नए साल कई

बेसबब देते हैं क्यों लोग मुबारक बादें
गालिबन भूल गए वक्त की कडवी यादें

तेरी आमद से घटी उमर जहां में सभी की
फैज नयी लिखी है यह नज्म निराले ढब की

— फैज़ अहमद फैज़*

* The book Saare Sukhan Hamare (complete works of Faiz) that I have does not list this ghazal. However, at several independent places on the net I found this ghazal attributed to Faiz Ahmed Faiz. Comments/views on this invited.

खल्क – दुनिया
हिदस: – गणित (count, number)
जिद्दत – नयी बात (novelty)
करीन: – ढ़ंग
मान-दहार – समय (time period)
ग़ालिबन – शायद
आमद – आने से

Faiz – Na gavaon navak-e-neemkash

This ghazal of Faiz Ahmed Faiz is beyond translation but I am attempting it nevertheless. The poem is a statement of politics and struggle of his times.

न गवाओं नावके-नीमकश, दिले रेज़ा रेज़ा गवाँ दिया
जो बचे हैं संग समेट लो, तने दाग़ दाग़ लुटा दिया

मेरे चारगर को नवेद हो सफे दुशमनों को खबर करो
जो वो कर्ज़ रखते थे जान पर वो हिसाब आज चका दिया

करो कज़ ज़बीं पे सरे कफन मेरे कातिलों को गुमां न हो
कि गुरूरे इश्क का बाँकपन पसे मर्ग हमने भुला दिया

उधर एक हर्फ की कुश्तनी यहाँ लाख उज्र था गुफ्तनी
जो कहा तो सुनके उड़ा दिया जो लिखा तो पढ़ के मिटा दिया

जो रुके तो कोहे गराँ थे हम जो चले तो जाँ से गुज़र गये
रहे यार हमने कदम कदम तुझे याद ग़ार बना दिया

-फैज़ अहमद फैज़

Do not waste your (half drawn) arrows, my broken heart is already lost
Save the left over stones, my body is already wounded and wasted

Give the good news to my healer, let the rows of my enemy know
He whose soul was indebted,  has settled all his debt today

Keep the shroud on my head today, my murders should not have any misgivings
that I forgot the pride of being in love on my way to death (or after death)

They had just one word, and I had lakhs to explain as excuses (of my deeds)
When I told (you) did not pay attention, when I wrote, (you) read and erased them

When I stopped, I was a like a mountain, when I walked, I walked past life itself
Every step of the path I tread I have made a memorial of my beloved.

तुम अपनी करनी कर गुज़रो

Very few poets move me as much as Faiz Ahmed Faiz does. His poetry pierces my heart, bleeds it and then heals it and inspires it. What can I say more.. I keep searching for words to describe my emotions, my feelings and then all I have to do is open a book and read Faiz Ahmed Faiz.

अब क्यूँ उस दिन का जिक्र करो
जब दिल टुकड़े हो जायेगा
और सारे ग़म मिट जायेंगे
जो कुछ पाया खो जायेगा
जो मिल न सका वो पायेंगे
ये दिन तो वही पहला दिन है
जो पहला दिन था चाहत का
हम जिसकी तमन्ना करते रहे
और जिससे हरदम डरते रहे
ये दिन तो कितनी बार आया
सौ बार बसे और उजड़ गये
सौ बार लुटे और भर पाया

अब क्यूँ उस दिन का जिक्र करो
जब दिल टुकडे हो जायेगा
और सारे ग़म मिट जायेंगे
तुम ख़ौफ़ो-ख़तर से दरगुज़रो
जो होना है सो होना है
गर हंसना है तो हंसना है
गर रोना है तो रोना है
तुम अपनी करनी कर गुज़रो
जो होगा देखा जायेगा

–फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

बोल कि थोड़ा वक्त बहुत है

बोल, कि लब आज़ाद हैं तेरे
बोल, ज़बां अब तक तेरी है
तेरा सुतवां जिस्म है तेरा
बोल, कि जाँ अब तक तेरी है
देख कि आहन-गर की दुकां में
तुन्द हैं शोले, सुर्ख हैं आहन
खुलने लगे कुफ्लों के दहाने
फैला हर इक ज़ंजीर का दामन
बोल, कि थोड़ा वक्त बहुत है
ज़िस्मों ज़ुबां की मौत से पहले
बोल, कि सच ज़िन्दा है अब तक
बोल, जो कुछ कहना है कह ले 

_ फैज़ अहमद फैज़

Speak up, while your lips (thoughts) are (still) free
speak up, (while) your tongue is still yours
Speak, for your strong body is your own
speak, (while) your soul is still yours
Look at blacksmiths shop
hot flames makes the iron red hot
opening the (jaws of) locks
every chain opens up and begins to break
speak for this brief time is long enough
before yours body and words die
speak, for the truth still prevails
speak up, say what you must.

Such strong and powerful urdu words of Faiz Ahmed Faiz, translating them into English does not bring out the power the verse contains.

“I weaved it all in my poetry, everything you ever spoke to me”

Hamne sab Sher mein sawanre thae
hamse jitne sukhan tumhare thae

Rangon khushboo kae husno khoobi kae
Tum se thae jitne istiyare thae

Tere kaulo karar se pehle
Apne kuch aur bhee sahare thae

Mere daaman mein aa gire saare
Jitne dashte falak mein taare thae

Translating beautiful poetry penned by Faiz Ahmed Faiz is just not possible, specially if you wish to bring out the meaning in the translation as beautifully as the poet has.
All I can do is sit and listen to it again and again. Sung beautifully by Abida Parveen, the CD comes with a small booklet with biographies of poet and singer along with lyrics and meanings of difficult words.