या मुझे अफसरे शाहा न बनाया होता – ज़फर

Bahadur Shah Zafar, the last Mughal king was also a poet. Though his literary standing was not as high as as his Ustad (Mohd. Ibhrahim Zauk) or his contemporaries Ghalib and Momin; his writings are much respected and appreciated. Zafar was a king (though in British raaj his kingdom did not extend beyond the red fort) and a freedom fighter.

This ghazal is one of his finest works specially when you read it in context to India’s freedom struggle and a helpless (and impotent when it came to doing anything for his country and men) king’s sentiments.

या मुझे अफसरे शाहा न बनाया होता
या मेरा ताज गदाया न बनाया होता

खाकसारी के लिए गरचे बनाया था मुझे
काश संगे-दरे-जाना न बनाया होता

नशा-ए-इश्क का गर ज़र्फ दिया था मुझको
उम्र का तंग न पैमाना बनाया होता

रोज़ मामूरा-ए-दुनिया में खराबी है ‘जफर’
ऐसी बस्ती से तो वीराना बनाया होता

अफसरे शाहा – शहंशाह
गदाया – भीख में मिला हुआ
खाकसारी – नम्रता, politeness
संगे-दरे-जाना – महबूब के दरवाज़े का पत्थर
ज़र्फ – योग्यता
तंग -छोटा, पैमाना – नाप actual meaning of paimana is wine goblet
मामूरा – शहर

Dr. Zarina Sani, my Ammi.

http://www.zarinasani.org goes live today. It is a website about mother-in-in law, Dr. Zarina Sani’s literary works.

I find it difficult to describe the range of emotions I went through while creating this site. I smiled, laughed, cried and marveled at the way she expressed herself. Through her writings I even got a glimpse of my husband’s childhood (मेरा फनकार)

Never having met her, I only knew her through my husband, Tarique , my brother-in-law Nadeem and the others in the family. My father-in-law would talk a lot about her to me and he regularly read out the poems she wrote. So I knew her as a wife, a mother, a sister and an aunt.

When I got a chance to go through her writings first hand, her poetry, her stories and her books, I discovered the woman in her. A strong, positive woman, deeply attached to her roots, family and beliefs. Her poetry touched me – she wrote from her heart and about the matters close to her heart; be it her children, her country, her love or her relationships.

Today would have been her 75th birthday; I have transcribed and put on her website 56 of her published poems. It will be my endeavor to keep updating the website often. I will update the poems with meanings of difficult words, will post some of the stories she had written and will publish online her literary works on Safdar Aah Sitapuri, Seemab Akbarabadi, Sadat Hasan “Manto” and Zia Fathehabadi.

Today, Through her poetry I am sharing her eclectic world with the world. I miss you, Ammi, but I also know that your blessings will always be with your children.

शक्ल धुधंली सी – एक अाज़ाद ग़ज़ल

Dr. Zarina Sani
Dr. Zarina Sani

शक्ल धुधंली सी है शीशे में निखर जायेगी,
मेरे अहसास की गर्मी से संवर जायेगी

अाज वो काली घटाओं पे हैं नाज़ां लेकिन,
चाँद सी रौशनी बालों में उतर अायेगी

जिन्दगी मर्हला-ए-दार-ओ-रस्ल हो जैसे
दिल की बेचारगी ता-वक्त सहर जायेगी

ज़ौक तरकीब से थी कोख़ सदफ़ की महरूम
कैसा अंधेरा है ये बात मगर अब्र के सर जायेगी

मोहनी ड़ाल रही है गुलतर की सूरत
ज़द पे अायेगी हवा के वोह, बिखर जायेगी

वक्त रफ्तार का बहता हुअा दरिया “सानी”
जिन्दगी अापके साये में नहीं, न सही फिर भी गुज़र जायेगी

— ज़रीना सानी

* अाज़ाद ग़ज़ल : जब ग़ज़ल के शेरों से मीटर की पाबंदी हटा दी जाती है मगर रदीफ और क़ाफिये की पाबंदी बरकार रखी जाती है.  ड़ा. ज़रीना सानी अाज़ाद ग़ज़ल की समर्थक थीं, अौर उन्होंने कई ऐसी ग़ज़लें लिखीं.

रदीफ: अशअार का वो शब्द जो दोनों मिसरों मे अाता है (शेर की हर पंक्ति को मिसरा कहते हैं)  (जायेगी, अायेगी)

क़ाफीया: वह शब्द जो शेर की हर पंक्ती में रदीफ के पहले अाता है (निखर, संवर, उतर)

मर्हला — destination
दार-ओ-रस्ल -gallows and prison
सदफ़ – sea shell
महरूम -deprived (here barren -the sea shell is without a pearl)
अब्र- clouds (rain clouds)


This aazad ghazal was published in the magazine “Kohsaar” in March 1980

तुम अपनी करनी कर गुज़रो

Very few poets move me as much as Faiz Ahmed Faiz does. His poetry pierces my heart, bleeds it and then heals it and inspires it. What can I say more.. I keep searching for words to describe my emotions, my feelings and then all I have to do is open a book and read Faiz Ahmed Faiz.

अब क्यूँ उस दिन का जिक्र करो
जब दिल टुकड़े हो जायेगा
और सारे ग़म मिट जायेंगे
जो कुछ पाया खो जायेगा
जो मिल न सका वो पायेंगे
ये दिन तो वही पहला दिन है
जो पहला दिन था चाहत का
हम जिसकी तमन्ना करते रहे
और जिससे हरदम डरते रहे
ये दिन तो कितनी बार आया
सौ बार बसे और उजड़ गये
सौ बार लुटे और भर पाया

अब क्यूँ उस दिन का जिक्र करो
जब दिल टुकडे हो जायेगा
और सारे ग़म मिट जायेंगे
तुम ख़ौफ़ो-ख़तर से दरगुज़रो
जो होना है सो होना है
गर हंसना है तो हंसना है
गर रोना है तो रोना है
तुम अपनी करनी कर गुज़रो
जो होगा देखा जायेगा

–फ़ैज़ अहमद फ़ैज़


This aazad nazm is from a very old television serial “Tanha” I remember switching on the TV set just to listen to the beautiful title song written by Javed Akhtar. After a long search I finally found it on youtube.

देखिये तो लगता है
ज़िन्दगी की राहों में
एक भीड़ चलती है
सोचिये तो लगता है
भीड़ में हैं सब तन्हा

जितने भी ये रिश्ते हैं
काँच के खिलौने है
पल में टूट सकते है
एक पल में हो जाये
कोई जाने कब तन्हा

देखिये तो लगता है
जैसे ये जो दुनिया है
कितनी रंगी महफिल है
सोचिये तो लगता है
कितना ग़म हैं दुनिया में
कितना ज़ख्मी हर दिल है

वो जो मुस्कुराते थे
जो किसी को ख्वाबों में
अपने पास पाते थे
उनकी नींद टूटी है
और हैं वो अब तन्हा


पहले तुझे आना होगा…

मैं न कहता था मेरे घर में भी आयेगी बहार
शर्त इतनी थी कि पहले तुझे आना होगा
                                     —कैफी आज़मी