दोस्त (دوست)

 

कोई गर पूछे
की कौन थी वो
तुम सिर्फ़ अहिस्ता
से मुस्कुरा देना
कहना कुछ नहीं

ज़रा सी बात है
मिलना था तुमसे
वक़्त बिताना था साथ
कुछ बातें करनी थीं
कुछ ख़ास नहीं

यूँ तो कट जाते हैं
मसरूफ़ियत में दिन
मगर कुछ है जो
अधूरा सा लगता है
क्या तुम्हें भी?

मिल ना भी सको
तो कोई बात नहीं
आज नहीं तो
कभी और सही
या ना ही सही

मगर, कौन है वो
लोग पूछेंगे ज़रूर
तो तुम बस ये कहना
दोस्त है एक
कच्ची पक्की सी

– स्वाति सानी “रेशम”

کوئی گر پوچھے
کہ کون تھی وہ
تم صرف  آہستہ
سے مسکرا دینا
کہنا کچھ نہیں

زرا سی بات ہے
ملنا تھا تم سے
وقت بتانا تھا ساتھ
کچھ باتیں کرنی تھیں
کچھ خاص نہیں

یوں تہ کٹ جاتے ہیں
مصروفیت میں دن
مگرکچھ ہے جو
ادھورا سا لگتا ہے
کیا تمہیں بھی؟

مل نہ بھی سکو
تو کوئی بات نہیں
آج نہیں تو
کبھی اور سہی
یہ نہ ہی سہی

مگر، کون ہے وہ
لوگ پوچھیں گے زرور
تو تم بس یہ کہنا
دوست ہے ایک
کچی پکی سی

– سواتی ثانی ریشم

 

Photo Credits: Foter.com

आज़ादी

ये करीने से उगाए हुये फूल पत्ते
कतार में खड़े सलामी देते पेड़
और मेनिक्युअर्ड लॉन
मुझे कब भाये कि तुम समझ बैठे
कि तुम मुझे पसंद आओगे
बोलो तो?

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व्यथा कथा

hina
हथेली की हिना सूख जायेगी
मगर उसकी छाया
हाथों पर उभर आयेगी
हथेली लाल हो जायेगी

हिना की ठंड़क और स्पर्श की गर्मी
अहसास दिलायेगी उस तारे का
जिसे एक दिन तुमने
मेरी हथेली का फूल कहा था

तुम्हें याद है वो दिन?
जब ऊँची पहाड़ी पर चढ़ते चढ़ते
पाँव फिसला था,
और हौसला टूटा था
तब तुमने उस तारे से तुलना की थी मेरी

कहा था
स्वाति को भी चातक का
इंतज़ार करना पड़ता है
तीन मौसम

मगर चातक,
स्वाति की एक बूंद के लिये
तुम्हें भी तो तीन मौसम
प्यास सहनी पड़ती है।

क्या कहिये मुझे क्या याद आया

मजरूह की यह नज़म मुझे बेहद पसंद है। एक मीठा सा भोलापन और भीनी-भीनी खुशबू है इसमें जो मेरे अंदर बस गयी है इसे पढ़ने के बाद।

फिर शाम का आँचल लहराया

मग़रिब में वो तारा एक चमका,
फिर शाम का परचम लहराया
शबनम सा वो मोती इक टपका,
फ़ितरत ने आँचल फैलाया
नज़रें बहकी, दिल बहला,
क्या कहिये मुझे क्या याद आया
टीले की तरफ चरवाहे की,
बंसी की सदा हल्की हल्की
है शाम की देवी की चुनरी,
शानों से परी ढ़लकी ढ़लकी
रह रह के धड़कते सीने में,
अहसास की मय छलकी छलकी
इस बात ने कितना तड़पाया,
क्या कहिये मुझे क्या याद आया

— मजरूह सुल्तानपुरी

अकेली पंक्तियाँ

एक अकेला कोना
भी नहीं मिलता
इस बड़े से घर में
जहाँ जा कर मैं
कुछ मन हलका करूँ
नमकीन आसुँओ से
अपनी बात कहूँ
और खुद से ही
शिकायत कर पाऊँ…

ये घर
मेरा ही तो है
जो खुशियों से
इतना भरा है
कि दुख अपने आप को
अक्सर अकेला पाता है
गले तक आ कर
फिर निग़ल लिया
जाता है।

होली का चाँद

होली का चाँद

आज शाम मैंने जो देखा छैल छबीला चाँद
तुमने भी तो देखा होगा इस होली का चाँद

झाँक झाँक कर ताक ताक कर बुला रहा वो
मुझको क्यों कर सता रहा  चमकीला चाँद

रंग लगा के लाल गुलाबी आया था छत पर
नील गगन में रहने वाला वही नशीला चाँद

बुला रहा था पिछवाडे से चुपके चुपके
था वो मेरा दिलबर एक सजीला चाँद

दबे पाँव आया था वो कुछ कहने मुझसे
बैठ गयी मैं देहरी पर देख रंगीला चाँद

मैंने भी तो घंटो कर ली बातें उससे
तुमको भी तो सुनता होगा एक अकेला चाँद

मैं ना कहती थी याद तुम्हें मैं आऊंगी
जब देखोगे आँगन में एक हठीला चाँद

Remember me!

There is this thing about being,
a fragile a song that we all sing.
And then darkness comes beckoning,
for death is certain for all those living.

Here I have  a request sincere,
when you are alone you must not fear.
So even when I am gone, my dear,
just look around and you will find me near.

You’ll find me in the pages that I write,
and in the poems that I recite.
In the sunshine bright,
and in the moonbeam at night.

It is possible that once in a while,
you will miss me half way through a mile.
But you must then think of me with a smile
and my life would be worthwhile.