चाँद और चुप

हर रात चीखती है खामोशी

चाँद बेबस मुँह तकता है उसका

सहम कर छोटा होता जाता है

सिकुड़ कर बिलकुल ख्तम हो जाता है

काली रात में सन्नाटे भी कम बोलते है…

सहमा चाँद हौले से झाँकता है

चुप्पी सुन बहादुरी से सीना फैलाता है

और धीरे धीरे फूल कर वह कुप्पा हो जाता है

डरपोक चाँद बहादुरी की मिसाल बन जाता है

होली का चाँद

आज शाम मैंने जो देखा छैल छबीला चाँद
तुमने भी तो देखा होगा इस होली का चाँद

झाँक झाँक कर ताक ताक कर बुला रहा वो
मुझको क्यों कर सता रहा  चमकीला चाँद

रंग लगा के लाल गुलाबी आया था छत पर
नील गगन में रहने वाला वही नशीला चाँद

बुला रहा था पिछवाडे से चुपके चुपके
था वो मेरा दिलबर एक सजीला चाँद

दबे पाँव आया था वो कुछ कहने मुझसे
बैठ गयी मैं देहरी पर देख रंगीला चाँद

मैंने भी तो घंटो कर ली बातें उससे
तुमको भी तो सुनता होगा एक अकेला चाँद

मैं ना कहती थी याद तुम्हें मैं आऊंगी
जब देखोगे आँगन में एक हठीला चाँद

– स्वाति सानी ‘रेशम’