या मुझे अफसरे शाहा न बनाया होता – ज़फर

Bahadur Shah Zafar, the last Mughal king was also a poet. Though his literary standing was not as high as as his Ustad (Mohd. Ibhrahim Zauk) or his contemporaries Ghalib and Momin; his writings are much respected and appreciated. Zafar was a king (though in British raaj his kingdom did not extend beyond the red fort) and a freedom fighter.

This ghazal is one of his finest works specially when you read it in context to India’s freedom struggle and a helpless (and impotent when it came to doing anything for his country and men) king’s sentiments.

या मुझे अफसरे शाहा न बनाया होता
या मेरा ताज गदाया न बनाया होता

खाकसारी के लिए गरचे बनाया था मुझे
काश संगे-दरे-जाना न बनाया होता

नशा-ए-इश्क का गर ज़र्फ दिया था मुझको
उम्र का तंग न पैमाना बनाया होता

रोज़ मामूरा-ए-दुनिया में खराबी है ‘जफर’
ऐसी बस्ती से तो वीराना बनाया होता

अफसरे शाहा – शहंशाह
गदाया – भीख में मिला हुआ
खाकसारी – नम्रता, politeness
संगे-दरे-जाना – महबूब के दरवाज़े का पत्थर
ज़र्फ – योग्यता
तंग -छोटा, पैमाना – नाप actual meaning of paimana is wine goblet
मामूरा – शहर

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