दूजी पाती

December 1990.

During the ISABS workshop on the first day,  participants were asked to introduce themselves. This was my introduction. It still is.

पंथी एकाकी सूने जीवन की

मैं यूँ पथ पर चलते चलते

ढूडूँ खुद को हर ओर छोर

हर नहर ड़गर आँगन अंबर

पतझड के एक झंकोरे में

पाती मेरी उड़ उड़ जाती

फिर गिर पड़ कर मैं

उठ जाती औ फिर हौले से

आँचल के छोटे कोने से

कोर नयन की सहलाती

फिर ठहर सहर के कोने पर

लिखती दूजी पाती स्वाति

अक्सर

From the diary of 1986

सर्दियों के घने कुहाँसे में अक्सर

धुंदला सा एक चेहरा उभरता है

उस चेहरे को एक बार फिर

करीब से देखने को जी करता है

और इसी कोशिश में अक्सर

खिड़कियों के काँच जख्म दे जातें हैं

रूह सहम सी जाती है

और वह धुंदलाता चेहरा

परछाईं बन अंधकार में

फिर गुम हो जाता है

साये

From the pages of my very old diary. I wrote this one 23 years back, in 1988.

उजड़े मकानों के साये में,

उसी राह के मोड़ पर

वह अचानक टकराना

नज़रें मिलाना

परिचय की कौंध का पल को उभरना

और लुप्त हो जाना

अनपहचाने चेहरों  का लिबास ओढ़े

आहिस्ता से गुज़र जाना

फिर किसी विध्वंसक ज्वालामुखी का फ़ूटना

मन के किसी कोने में, उस गर्म उबलते लावे में

अतीत का पिधलना, उबलना और पथरा जाना

चाँद का आइना

Full Moon at Pench कल शब बड़ी देर तक निकला रहा चाँद

चाँदनी पिरोती, ओस गिरती रही, रात घिरती रही ।

कल शब तुम्हारी अलसाई बाहों में आने को मचलता रहा चाँद

बेदम ठंड़ी साँसो को गर्म करता रहा चाँद ।

कल शब बहुत उदास रहा चाँद

सितारे थे तुम्हारी आगोश में, राह तकता रहा चाँद ।